मोतिया-गंगा लोकगाथा


यह गाथा कुमाऊँ क्षेत्र में झोड़ा वर्ग के गीतों के अंतर्गत आती है किन्तु कुछ विद्वानों द्वारा इसका उल्लेख कृषि सम्बंधित गीत गाथाओं के अंतर्गत माना जाता है ।


कुमाऊँ में सोन की डूँगरी में मोतिया सौन और उसकी रानी गंगा रहते थे । वे निःसंतान थे । उन्होंने देवता के नाम पर प्रत्येक पत्थर की पूजा की तथा तीर्थों के नाम पर सभी छोटी व बड़ी नदियों में स्नान किया किन्तु फिर भी उनको कोई सन्तानोतपति नही हुई । वे दोनों ही वृद्धावस्था में पहुंच चुके थे । एक दिन मोतिया सौन की पत्नी गंगा अपनी गागर उठाकर प्रातः काल नौले (पनघट) पर पानी भरने जाती है । पनघट पर पूर्व से स्त्रियां उन्ही के बारे में चर्चा कर रही होती हैं । वहां पर सभी स्त्रियां उस निःसंतान दम्पति की जमीन जायजाद के बंटवारे के सम्बन्ध में चर्चा कर रही होती थी । गंगा ने यह सब कुछ सुन लिया था अतैव वह उनके बीच न बैठकर तुरन्त ही पानी भरकर वहां से घर को लौट गई । मार्ग में लौटते हुए उसे अत्यंत क्षोभ हो रहा था कि निःसंतान होने के कारण उनके जीवित रहते ही उनकी संपति के बंटवारे की बात होने लगी है । अपने कानो सुनी बात, वह रोते हुए अपने पति से जाकर कहती है । मोतिया सौन का मन व्यथित हो जाता है । उसी दिन, रात्रि के अंतिम पहर में गंगा को स्वप्न होता है । स्वप्न में जोगी के वेष में एक देवता उससे कहता है कि मैं झाँकरसेम का जोगी हूँ । तुमने देवताओं के नाम पर सभी स्थान पूज डाले लेकिन कभी भी मेरे स्थान झाँकर में नही आए, क्योंकि तुम्हारा मुझ में विश्वास नही है । इएलिये मैं अपना विश्वास दिलाने हेतु अपना वचन दे रहा हूँ । तुम्हारे घर के पीछे जो सूखा हुआ पेड़ है, वह प्रातः काल हरा हो जाएगा। तभी तुम मुझ पे विश्वास करना ।

प्रातः जब मोतिया सौन व गंगा उस पेड़ को देखने जाते हैं, तो सत्य ही वह हरा भरा हो गया था । और जैसे ही उस पर दोनों की दृष्टिकोचर हुई गंगा अठारह वर्षीय युवती और मोतिया सौन पच्चीस वर्षीय युवक दिखाई देने लगे थे । उसी सूखे ठूँठ वृक्ष की भाँति कायाकल्प सा उनमें भी यौवन परिलक्षित होने लगा । उसके बाद दोनों पति-पत्नी पूजा समाग्री और अष्टबली हेतु बकरे इत्यादि लेकर अपने सगे-सम्बन्धियों के साथ झाँकर की ओर चल पड़े हैं । देवता के अनुसार बताए मार्ग पर वे पशु बलि देने वाले पुजारी तथा वादक धर्मदास को भी साथ ले जाते हैं । झाँकर पहुंचकर दोनों दम्पति ने विधिवत पूजा अर्चना की । झाँकर देव कृपा से गंगा तथा मोतिया सौन के घर पुत्ररत्न का जन्म होता है और सोन की डूँगरी में खुशियां छा जाती हैं ।



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