उत्तराखंड (गढ़वाल तथा कुमाऊँ) अपनी अनूठी संस्कृति के लिए जाना जाता है । वैसे तो अधिकांश रीति रिवाज एक जैसे दोनों ही मंडलों में मनाये जाते हैं लेकिन इनको गढ़वाल में अलग नाम से व कुमाऊँ में अलग नाम से सम्बोधित किया जाता है । दोनों मंडलों की बोली में भी काफी भिन्नता है । गढ़वाल क्षेत्र में बोली जाने वाली बोली गढ़वाली है तथा कुमाऊँ में कुमाऊनी । इनको भाषा का दर्जा नही है दोनों ही बोलियां हैं । पौराणिक धरोहर में अधिकांश आपको उत्तराखंड गढ़वाल क्षेत्र की वस्तुओं, घटनाओं, वेषभूसा और रीति-रिवाजों का वर्णन मिलेगा । इस वेबसाइट के माध्यम से जितना हो सकेगा, प्रयास रहेगा की विलुप्त हो चुकी वस्तुओं और रीति-रिवाजों को लेकर आपके सामने पूर्ण जानकारी रखी जाये । क्योंकि आने वाली पीढियां उन बातों की परिकल्पा भी नही कर सकेगी, ऐसी प्रौद्योगिकी विकास में सब धुंधला हो जायेगा । उत्तराखंड में बहुत सारे रीति रिवाज समय के साथ साथ आये जो कि दूसरे राज्यों के लोग मनाते थे । उदाहरण के लिए करवा-चौथ जैसे उपवास उत्तराखंड गढ़वाल क्षेत्र में नही मनाया जाता था ।

समय के चक्र में बने रहने की दौड़ ने हमे सिर्फ दौड़ना सिखया है लेकिन विपरीत परिस्थियों में जीना नही सिखया । क्योंकि वक्त ने सिर्फ एक चीज को सीखने पर जोर दिया कि पैसे कैसे कमाएं । लेकिन उस पैसे से आप आत्मनिर्भर नही हुए क्योंकि आप भोजन, स्वास्थ्य जैसी मूल भूत सुविधाओ के लिए दूसरों पर निर्भर होते चले गये । क्योंकि शाररिक कसरत आपके जीवन में रही नही और मानशिक थकान से आप ग्रसित होते चले गये जिस कारण स्वस्थ्य कम उम्र में ही गड़बड़ाने लगा । जिस वजह से आपको निर्भरता की आवश्यकता उम्र के युवा पड़ाव में ही आने लगी । पैसों से आपने अपने उत्सव तो मनाये लेकिन आपने अपनी मूल भूत धरोहर या रीति-रिवाज को छोड़ दिया और उसके विलुप्त होने का खतरा बढ़ता गया । आज बहुत सारी परम्पराएँ लगभग खत्म हो गयी है और उनके अवशेष ही शेष रह गये हैं । ऐसे ही विलुप्त हो चुके रोचक तथ्यों से जुड़ी पूर्ण जानकारी को लेकर हमने इस पेज को जोड़ने का फैसला किया है । आप अगर इन जानकारियों को समय समय पर खुद बा खुद प्राप्त करना चाहते हैं तो वेबसाइट पर ईमेल सब्सक्रिप्शन ऑप्शन पर अपना ईमेल डाल कर सब्सक्राइब कर लें आपको हमारा हर अपडेट मिलता रहेगा । नीचे दिए हुए लिंको को स्पर्श कर उसके विषय में पूर्ण जानकारी हासिल करें और पसन्द आये तो दूसरे लोगों के साथ भी साँझा करें क्योंकि यही हमारी पौराणिक धरोहर है और इन्ही से हमारे संस्कार भी हैं ।