यह लोकगाथा प्रसंग सरू तथा भड़ पुरुष गढु सुम्याल पर आधारित है । एक साल गढु सुम्याल के गढ़ खिमसारीहाट में अन्न का अकाल पड़ जाता है और वह अपनी माँ को लेकर अरुणीवन चला जाता है । जहाँ भैंस पालन कर दोनों माँ बेटा अपना जीवन यापन करने लगते हैं । अरुणीवन में गढु सुम्याल बांसुरी की मधुर धुन बजाते हुए अपनी भैंसे चराता है । कई दिनों से रामगंगा के उस पार सरू इस मधुर धुन को सुन रही होती है । और उसी धुन पर मोहित होकर सरू रामगंगा को पार कर एक दिन अरुणीवन पहुंच जाती है । सरू गंगोलीहाट के अपने राजमहल में रहती है । वह यौवन से भरपूर केवल बारह वर्ष की युवती है । उसका भरपूर यौवन उसकी कम आयु से भिन्न है और उसकी भरी हुई बाहों की खनकती चूड़ियां मानो किसी को भी मोह ले ।


 

गंगोलीहाट में ही वह बाँसुरी की मधुर ध्वनि सुनकर मोहित हो उठती है । वह सोचती है - हे बांसुरी बजया, तेरी बाँसुरी की धुन सुनकर मैं धन्य हो गयी । वह मन ही मन कल्पना करने लगती है कि वह कहां का निवासी होगा ? जो इतनी सुरीली बाँसुरी बजाता है । इसी चिंता में वह अन्न जल ग्रहण करना छोड़ देती है और बाँसुरी की धुन की दासी बन जाती है । एक दिन सरू स्नान करने के लिए जल धारे के समीप आकर बैठ जाती है कि तभी उसके कानो में बाँसुरी की मधुर ध्वनि सुनाई पड़ती है । सरू का मन विचलित हो उठता है और फिर वह अपने मन में निश्चय करती है - सरू जिस से बाँसुरी की ध्वनि आ रही है, मैं उसी बाँसुरी वादक को अपना प्रिया बनाऊँगी । वह हिमनद की तरह पिघलने लगी और ऊँची पहाड़ियों से उतरकर बाँसुरी वादक की ओर चुम्बक की भाँति खिंचती चली गयी । सरू ने जल से पूरित रामगंगा को तैर के पार किया और उस ऊँचे पहाड़ पर चढ़ने लगे जहां से बाँसुरी की मधुर ध्वनि आ रही थी । अपने उस अपरिचित प्रेमी को खोजती हुई सरू भैंसों के खरक तक पहुंच गयी, जहां बाँसुरी बादक का निवास स्थान था । जब तक सरू उसके निवास में प्रवेश करती, उसने बाँसुरी बजाना बन्द कर दिया और गहन निंद्रा में लीन हो गया । 

उसको सोया देख सरू ने उसे आवाज लगाई- 'हे बाँसुरी बजया' मैं तेरे पास पहुंच गयी हूँ । अपनी आंखे खोलो और मुझे अपनी इस मधुर ध्वनि में हमेशा हमेशा के लिए कैद कर लो । सरू को देखकर खरक की भैंसे चौंक सी गयी जिसकी आहत पाकर गढु सुम्याल एक दम खड़ा हो गया । गढु सुम्याल ने सौंदर्य से पूरित और यौवन से भरी सरू को देखा और पूछा तुम कौन हो ? सरू ने गढु सुम्याल को अपना पूरा वृतांत सुनाया । और उसके बाद गढु सुम्याल ने सरू को अपनी पत्नी रूप में स्वीकार कर लिया । अरुणीवन जहाँ गढु सुम्याल और उसकी माँ भैसों के खरक में अपना कष्टपूर्ण जीवन यापन कर रहे थे, सरू जैसी बहू पाकर वे मौज मस्ती और खुशियों से पूर्ण जीवन यापन करने लगे ।