जीतू बगड्वाल लोकगाथा



गढ़वाल राजा मानशाह के समय के वीर पुरुष थे जीतू बगड्वाल । मानशाह का कार्यकाल गढ़वाल क्षेत्र में 1591 से 1610 तक माना जाता है । इसी अवधि में जीतू बगड्वाल की वीरता की कहानियां उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में प्रसिद्ध हैं । जीतू बगड्वाल बगुड़ी गांव का रहने वाला वीर था, जो कि वर्तमान टिहरी जिले के अंतर्गत आता है । मानशाह के शासन काल में जीतू बगड्वाल मंत्री थे । जीतू बगड्वाल से प्रसन्न होकर मानशाह ने बगुड़ी का सेरा (पानी वाली जमीन) उपहारस्वरूप दे दिया था । 


गरीबू नामक व्यक्ति के जीतू और शोभना नामक दो पुत्र थे । ये लोग मूल रूप से पंवार जाति के क्षत्रिय लोग थे । जीतू वीरता के कार्य में निपुर्ण था इसलिए राजा मानशाह ने उसकी वीरता से खुश होकर उसे सामंती पदवी तथा बगुड़ी का सेरा पुरस्कार स्वरूप प्रदान किया । परंतु इन्हें प्राप्त करने के बाद जीतू अपने होस खो बैठा । उसने सामंती पद का दुरपयोग करते हुए बाँझ बैंसो, अविवाहित कन्याओं तथा बंद पड़ी पँचक्कियों पर भी कर लगा दिया । राजकोष बढ़ने से जीतू रानियों का रसिया बन जाता है । एक समय वर्ष शुरू होने पर जीतू को अपने सेरों (पानी वाली जमीन) में धान की रोपाई करनी थी । अतैव वह धान की रोपाई का शुभ दिन जानने हेतु अपने भाई शोभनू को पंडित के पास भेजता है । पंडित दिन देखता है तो वह कहता है कि इस वर्ष धान की रोपाई तुम्हारी बहिन के हाथों से होगी तो फसल अच्छी होगी । यह सब जानकर जीतू की माँ जीतू के भाई शोभनू को उसकी बहिन (विवाहिता) को लेकर आने को कहता है । लेकिन जीतू बहिन को लेने जाने की जिद्द पकड़ लेता है कि उसको लेने तो मैं स्वयं जाऊंगा । इतने में एक बकरी छींकती जाती है तो माँ कहती है, बेटा ! तू मत जा तेरे लिए अपशकुन हो गया है । लेकिन जीतू नही मानता है । वह अपने वस्त्र धारण करता है और बाँसुरी उठा के चल देता है । यह देखकर पत्नी भी पीछे से रोकने की कोशिश करती है मगर जीतू नही रुकता है । ऊंची पहाड़ियों और गहरी घाटियों को पार करता हुआ जीतू कड़ी धूप और दोपहर में रैथल नामक स्थान पर पहुंच जाता है । वहां पर आराम करते हुए जीतू अपनी बाँसुरी बजाने लगता है । उसकी बाँसुरी की धुन ऊंचे-ऊंचे पहाड़ो पर गूंजने लगती है और खैट की अछरियाँ (एक प्रकार की आत्माएं) भी जाग जाती हैं । जीतू की आंखों के आगे मानों अप्सराएं नाचने लगती है । जीतू धीरे-धीरे बेहोश होने लगता है । अछरियाँ जीतू का खून चूसने लगती हैं । तभी जीतू अपने कुल देव भैरव का स्मरण करता है । हे कुल देवता भैरव ! मुझ पर संकट आ गया है मेरी मदद करो । भैरव जीतू की पुकार सुन लेता है और अछरियाँ जीतू को छोड़ देती हैं । लेकिन अछरिययों के जाते-जाते जीतू उनसे अपने धान के खेत में मिलने का वचन देता है । उसके बाद जीतू वहां से उठकर अपनी बहिन के गांव पहुंच जाता है। वहां साली के आदर सत्कार में जीतू साली में खो जाता है । लेकिन रह-रह कर उसको अछरियाँ याद आती है अतैव वह साली से पुनः मिलने का कोई वादा पर न करके उसको भी बहिन के साथ ही  बगुड़ी गांव लौट आता है । छः गते आषाढ़ धान की रोपाई का दिन आ जाता है । हर्षोल्लास के साथ बैलों की जोड़ी व बहिन सहित सभी परिवार के लोग भी खेतों में पहुंच जाते हैं । जीतू आधा खेत ही जोत पाता है कि उसका दिल बेचैन होने लगता है । एका-एक जीतू देखता है कि अछरियाँ उसकी तरफ बढ़े आ रही हैं । अछरियाँ जीतू के आंख ,कान और नाक पर बैठ जाती हैं और उसका खून चूसने लगती है । धान के खेत की रोपाई के लिए उसके साथ उसकी माँ, भाई, बहिन और साली साथ थी । अचानक खेत के बीच में एक दरार फ़टी और सारा परिवार हल बैल सहित उस काल के अंधकार अतल में डूब गए । जीतू ने जो भी अनिष्ट कार्य किए थे उसके फलस्वरूप उसके साथ यह सब घटित हुआ । पहाड़ों पर जीतू का यह चरित्र प्रबंध गीत और कथा के रूप में आज भी सुनाया जाता है । जो कि गढ़वाली बोली पर आधारित है । जिसकी अंतिम कुछ पंकितयां निम्न प्रकार से है- 


नौ बैणी आछरी ऐनी, बार बैणी भरडि,
क्वी बैणी बैठीन कन्दूड्यों का घर,
क्वी बैणी बैठीन आंख्यों का स्वर,
छालों पीनी लोई, आलो खाई मासू ।


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