जसी की लोकमानस गाथा


जसी अपनी माता-पिता की इकलौती संतान है, जिसका विवाह कोलागढ़ के योद्धा से होता है । एक दिन जब उसका पति किसी कार्य हेतु घर से बाहर गया होता है तो क्रुद्ध सास द्वारा उसकी हत्या कर दी जाती है । पति के लौट आने पर पत्नी की दुखद मृत्यु का समाचार पाकर उसको बहुत दुःख होता है । पश्चाताप और गलानी से वह जसी को पुकार कर उसको ईश्वर से वापस माँगता है तथा जसी पुनः जीवित हो उठती है ।


राजा हरिश्चंद्र महादानी था । उसकी हवादार अटारी और सुंदर बैठकें थी । पहाड़ की चोटियों पर गौशालाएं थी, तो नदी के किनारे पँचक्कियां चलती थी । इसी प्रकार उसकी पत्नी धर्मावती भी अपने नाम के अनुकूल रूपवती और परोपकारी थी । उन्होंने घाटियों के प्रत्येक पत्थर तथा पहाड़ की प्रत्येक चोटी को पूज दिया था । किन्तु उनको कोई सन्तान प्राप्त नही हुई । कालांतर में उनके घर एक कन्या ने जन्म लिया । कन्या के जन्म पर पण्डितों का कहना था कि यह कन्या बहुत जसीली (यशस्विनी) है अतैव उसका नामकर्ण जसी ही कर दिया गया । जसी रूप और सौंदर्य से युक्त चन्द्रमा की कलाओं सी स्वेत वर्णी है । समय के साथ साथ जसी धान की बाली के समान बड़ी होती गई और युवास्था में उनका विवाह कोलागढ़ के एक नामी योद्धा विरुवा भंडारी से किया गया । विरुवा और जसी की जोड़ी हंसों के जोड़ी के सदृश थी । दोनों के बीच मछली और जल के समान प्रेम था । जसी के प्रेम में विरुवा घर-संसार सब कुछ भूल गया । एक दिन विरुवा को सपने में अपने स्वर्गवासी पिता दिखाई देते हैं । सुबह होते ही वह अपनी प्रियतमा जसी से कहने लगा- मुझे पिताजी का पिण्डदान करने गया जाना होगा, मैं वहां से से शीघ्र ही लौट आऊंगा । जसी तुम्हारी स्मृति मेरे साथ छाया की तरह रहेगा और लौटते हुए तुम्हारे लिए वहां से कुछ वस्त्राभूषण लेकर आऊंगा । यह सुनते ही जसी का हृदय पुष्प की तरह मुरझा गया और आंखों से अश्रुधार बहने लगी । जसी ने कहा- स्वामी ! तुम तो मेरे सिर का छत्र (मुकुट) हो, गले का हार और सुहाग की बिंदी हो । मैं तुम्हारे विछोव में जीवित कैसे रह पाऊंगी ? और विरुवा से लिपट गयी ।

अगले दिन विरुवा ने तीर्थराज गया के लिए प्रस्थान किया । पति के जाने के बाद जसी को न दिन की भूख लगी और न रात्रि की नींद आयी । उसके चेहरे की रौनक शिथिल पड़ गयी ।उसकी सास पद्मावती जसी से मन ही मन ईर्ष्या खरती थी क्योंकि उसका पुत्र पत्नी के पल्लू से ऐसे बन्ध गया था कि उसको किसी दूसरे की सुध नही रही । पद्मावती सोचती थी कि इसने मेरे पुत्र पर पता नही कौनसा जादू टोना कर दिया है, अब उसके मन में मेरे लिए जरा भी ममता नही बची है । अब तो मुझे यह भी यकीन नही कि विरुवा मुझे एक गिलास पानी भी पिलाएगा । इसी अवधि में एक दिन जसी पनघट से पानी लेने के लिए तैयार हुई तथा अपनी सखी-सहेलियों को साथ लेकर पनघट में पहुंची । एक एक कर उसकी सभी सखियाँ पानी भरकर घर लौट आयी लेकिन जसी वहीं पानी में जल क्रीड़ा करती रह गयी । अकस्मात उसने जल में पड़ी छाया को देखा । यह छाया उसके मुहबोली बहन के पति अर्थात जीजा (भीना) पदमू रौत की थी, जो समीप ही एक पेड़ की टहनी पर बैठा हुआ था । जसी ने पदमू से अपनी बहन तथा उनके बच्चों की राजी-खुशी पूछी । पदमू डाली से उतर कर उसके समीप जा बैठा और साली से ठठा मजाक करने लगा । मजाक मजाक में उसने साली जसी के बालों कई प्रकार के फूल कलियों सहित सजाए । जीजा से विदा लेकर जब वह घर लौट रही थी तो प्रतीक्षा में खड़ी सास की नजर उसकी माँग में सजे फूलों पर पड़ती है । यह देखकर उसके हृदय पर साँप लोटने लगते है और वह जसी पर बरस पड़ी - "इतनी देर पनघट पर किसके साथ थी ? तेरा कोई भाई अथवा बाप या मामा आया था ? जसी- सास जी ऐसी अप्रिय बातें न कहो । बात का बतंगड़ न बनाओ । पनघट पर मेरे मुँहबोले फलानी बहन के पति अर्थात जीजा पदमू रौत मिले थे । उनसे असल-कुशल पूछने में ही विलंब हो गया।" आप ऐसे तुच्छ लांछन मत लगाओ अन्यथा मैं गंगा में कूदकर आत्महत्या कर लूँगी ।

सास तो चाहती ही थी कि किसी तरह जसी से पिछा छूटे अतैव वह फिर झगड़ने लगी - "तू झूठी कुलटा है । तूने मेरे भोले भाले बेटे को इधर उधर की बातों में भरमा दिया है । मैं तुझे आज जिंदा नही छोडूंगी ।" पद्मावती (सास) ने क्रोधित हो उसकी गर्दन पर कटार से वार कर दिया और उसकी लास को घर के पिछले हिस्से में निम्बू के पेड़ के नीचे डाल दिया । तीर्थ से वापस लौट रहे पति ने रास्ते में ही एक बुरा स्वपन दिखा था जिससे आशांकित हो उसने घर पहुंच कर सबसे पहले पत्नी जसी को इधर उधर देखा किन्तु जसी कहीं नजर नही आयी । तब वह स्वयं उच्च स्वर में बोला - मेरी जसी राणी ! जल्दी बाहर आओ । मैं थका हुआ हूँ, मेरे लिए गंगा का शीतल जल लाओ । लेकिन न जसी बाहर आयी और न ही कोई उत्तर आया । बेटे की आवाज सुनकर उसकी माँ पद्मावती बाहर आई । उसके बाहर आते ही बेटा जसी के बारे में पूछता है तो माँ का चेहरा सिकुड़ जाता है और वह कहती है - " बेटा उस कुलटा का नाम मत ले । पनघट पर उसका जीजा पदमू रौत उससे मिलने आया था । जसी पाप करके देर से घर लौटी थी और उसी पाप के1 कारण उसी पाप के कारण उसने अपनी मौत का वरण किया है ।"

यह सुनते ही विरुवा भंडारी स्तब्ध हो गया । माँ तूने मेरी हंसनी को मुझसे अलग कर दिया है । मैं जसी जैसी स्त्री को कैसे प्राप्त करूँगा ? तब उसने अपने माँ से जसी के शव के बारे में पूछा । उसने शव को देखा और देखते ही मूर्च्छित हो गया । उसी मूर्च्छित अवस्था में उसके स्वपन में शिव पार्वती आकर उसको धीरज बंधाते है तथा जसी को जीवित करने का यत्न भी सुझाते हैं । थोड़े समय के बाद जब उनको होस आता है तो विरुवा जसी के मृत शरीर पर गंगाजल छिड़कते हुए कहता है- "यदि जसी ने कोई पाप न किया हो और वह पतिव्रता होगी तो जीवित हो उठेगी । कहा जाता है कि ईश्वर की कृपा और सतियों के सत से जसी उठकर खड़ी हो गयी । विरुवा का अपनी पत्नी पर अटूट विश्वास से अपनी जसी को पुनः प्राप्त कर लेता है । और इस प्राकार दो अटूट प्रेम के बंधन से बंधे प्रेमियों की यह गाथा उत्तराखण्ड में प्रसिद्ध हो जाती है ।

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