बालेश्वर मंदिर उत्तराखंड के चंपावत शहर के भीतर स्थित शिव को समर्पित एक प्राचीन मंदिर है। चंद वंश के शासकों द्वारा निर्मित, बालेश्वर मंदिर पत्थर की नक्काशी का एक अद्भुत प्रतीक है। बालेश्वर मंदिर की कोई ऐतिहासिक पांडुलिपियां नहीं हैं; हालाँकि, यह माना जाता है कि इसका निर्माण 10 वीं और 12 वीं शताब्दी ईस्वी के बीच हुआ था। मुख्य बालेश्वर मंदिर भगवान शिव (जिन्हें बालेश्वर के नाम से भी जाना जाता है) को समर्पित है। बालेश्वर के परिसर में दो अन्य मंदिर हैं, एक रत्नेश्वर और दूसरा चंपावती दुर्गा को समर्पित है। बालेश्वर मंदिर के समीप एक "नौला" (मीठे पानी का संसाधन) है। महाशिवरात्रि के दिन बालेश्वर मंदिर परिसर में बहुत भीड़ वाला मेला लगता है। रत्नेश्वर और चंपावती दुर्गा मंदिरों के बाहरी हिस्सों को स्थानीय देवताओं के अलग-अलग पोस्टरों से उकेरा गया है। 


मंदिर के बारे में कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 10 वीं या 12 वीं शताब्दी के मध्य काल में हुआ था | जिस कारीगर ने इस मंदिर में अपनी कला को जिंदा किया था , उसका नाम जगन्नाथ मिस्त्री था , यह कहा जाता है कि जब जगन्नाथ मिस्त्री ने मंदिर बना दिया था , तब चंद शासक जगन्नाथ मिस्त्री से काफी प्रसन्न हुए और साथ ही चंद शासकों को लगा कि जगन्नाथ मिस्त्री अपनी कला का प्रचार-प्रसार कहीं किसी और जगह ना कर दे इसलिए चंद्र शासकों ने जगन्नाथ मिस्त्री का एक हाथ कटवा दिया | तब जगन्नाथ मिस्त्री जो कि एक कुशल कारीगर था | उसने चंद शासको को जवाब देने की सोची और जगन्नाथ मिस्त्री ने बालेश्वर मंदिर से लगभग 4 किलोमीटर दूर “अद्वैत आश्रम“ से मायावती पैदल मार्ग में एक “हथिया नौला“ का निर्माण किया | एक हथिया नौला एक हाथ से बनी “बावली” की कहानी यह है कि जगन्नाथ मिस्त्री ने अपने एक हाथ के आधार और अपने बेटी की सहायता से एक रात में बनाया था | बालेश्वर मंदिर अपनी खूबसूरती के साथ अलग पहचान बनाए हुए हैं और मंदिर कि खूबसूरती लोगों को अपनी ओर खींचती है और सोचने को मजबूर कर देती है | मंदिर के हर हिस्से में एक अनेक प्रकार की कलाकृति देखने को मिलती है | पहले मंदिर परिसर में अनेक प्रकार की मूर्तियां थी लेकिन वर्तमान समय में मूर्ति को अलग कर दिया गया है |