यह गाथा उत्तराखंड के रवाईं क्षेत्र में प्रसिद्ध है । जिसमें जीवन मौज मस्ती के जीवन पर आधारित है । लेकिन अंत में मलारी की दुःखद मृत्यु के कारण गाथा कारुणिक बन जाती है ।


गजेसिंह नामक पशु चरवाहा अपने पशुओं को लेकर फतेह पर्वत के ऊंचे चरागाहों में जाता है, जहाँ उसकी भेंट दो अपरिचित युवतियों से होती है । वह दोनों युवतियां अपना परिचय देते हुए बताती है- "हम सोना-सांद्रा की विवाहित बहने हैं" । हमारा नाम सलारी और मलारी है । गजेसिंह (गज्जू) का मन मलारी को देख उस पर आसक्त हो जाता है । मलारी भी जब गज्जू की आंखों से अपनी नजरें मिलाती है तो चरागाहों और पुष्प घाटियों सहित गज्जू की आंखों में प्रतिबिंबित हो उठती है और उसके अंतर मन में गज्जू की जोत प्रज्वलित हो उठती है । और फिर उस पूरे चराहगा में उसको गज्जू के अलावा कोई दूसरा न दिखाई देता है और न प्रतीत होता है । मलारी का प्रेम गज्जू के प्रति दिन प्रतिदिन गहराता ही जाता है ।

एक दिन गज्जू (गजेसिंह) मलारी से कहता है कि, मलारी अब तेरे बिना मेरा रह पाना मुश्किल है अतैव तू भी मेरे साथ ही चल । मैं तुझसे विवाह कर अपनी पत्नी बना के रखूँगा । मेरे पास अन्न के कोठार (अनाज को रखने का लकड़ी का बॉक्स) हैं तथा हजारों भेड़-बकरियां हैं । मैं बारहों महीने इन्ही को चराता रहता हूँ । मलारी ! संध्या के समय तू मेरे पड़ाव (विश्राम स्थल) पर आना । यह सब सुनकर मलारी जवाब देती है - गज्जू आज जीभर बाते कर ले । कल सुबह होते ही मैं ससुराल चली जाऊंगी । गज्जू- मलारी तू ससुराल मत जाना, मेरा दिल दुखेगा । अब तुम भी अपने मन की व्यथा कह दो, मैं शिघ्र मनेरा चला जाऊंगा । मलारी कहती है - गज्जू तुम मेरे घर चले आना । अगर मेरे घर के कुत्ते तुम पे भौकेंगे तो भौंकने देना । मैं रस्सी के सहारे तुम्हें ऊपर तिबारी में खींच लूँगी ।


उनकी बातों बातों में चारों ओर कोहरा घिर गया । चारों ओर अंधेरा छा गया । चरागाह में बादलों से बरसात की हल्की फुहार पड़ने लगी । मलारी ने द्रवित होकर गज्जू की तरफ देखा और पास में खड़े मेमने के बालों को सहलाने लगी । समणिक प्रकृति के मध्य गज्जू अपनी आप बीती और संघर्ष का प्रसंग मलारी को सुनाया । मलारी कहती है- गज्जू तू अपनी बकरियों और भेड़ों को लेकर कोठार की तरफ चला जा । यहाँ लोग तुम्हारा हंसना और मेरा खेलना पसंद नही करते और हमसे ईर्ष्या करते हैं । या तो यहां से भागकर कहीं दूर चले जाते हैं या फिर जहर खा कर जीवनलीला समाप्त कर देते हैं । गज्जू कुछ कहो ना ? इस दूणि (घास फूस से बना छप्पर) में आग लगा देते है और यहां से भाग चलते हैं । गज्जू तुम से दिल लगाकर मैं तो तुम्हारे प्रेम की रोगी हो गयी हूँ ।

गज्जू मलारी को बाहों में लेते हुए कहता है - मलारी तू कल काम के लिए किस ओर जाएगी ? , मलारी - गज्जू मैं कल हिमरिया के खेतों में काम करने जाऊंगी । प्रेम बस आसक्त मलारी कहती है, गज्जू तुम वहीं आ जाना । मैं अपने मन की बातें किस्से कहूँगी ? लेकिन गज्जू तू मुझ पर अपना मन व्यर्थ ही रखता है, मैं तो किसी और की हूँ । मलारी की बहन  सलारी को गज्जू और मलारी की प्रेम कहानी पर आश्चर्य और भविष्य को लेकर वेदना होती है । किन्तु वह किसी से कुछ नही कहती है । गज्जू मलारी से मिले बिना ही तीन माह का सहवास पूर्ण कर वापस गाँव लौट आता है । मलारी गज्जू की व्यथा में अंतर्मखी होकर अपने ससुराल में भी कल्पनालोक में उड़ान भरती रहती है । किन्तु जब बहुत समय बीत जाने पर गज्जू नही आता तो अंत वह दुःख से आहत होकर रोगशैया पकड़ लेती है । एक दिन गज्जू को मलारी की बीमारी का सन्देश प्राप्त होता है । गज्जू खबर सुनकर उसके पास पहुंच जाता है । गज्जू को देखते ही मलारी करुण स्वर में बोली- गज्जू अब मेरा प्राणांत समीप है । नही ! मलारी ऐसे मत कहो- गज्जू ने कहा । और यदि तुम्हें कुछ हो गया तो मेरे जीवन का सहारा क्या रह जाएगा ? यह सुनकर मलारी अंतिम सांस लेते हुए बोली- गज्जू अपने वचनों को मत भूलना । गज्जू - मलारी ! मैं सदैव तेरा नाम अपने मुख में तथा तेरी सूरत अपने दिल में सजाकर रखूंगा । मलारी कुछ कहना चाहती थी किन्तु उसके होंठ अधखुले ही रह गए । तत्क्षण मलारी के प्राण निकल गये ।