Garhwali Poetry ( गढ़वाली कविताएं)




                    -1-
"पहाड़ी समझी मूर्ख नी चिताण"

लोगुन पीनी होलु घाट घाट कु पाणी दादू
मीन छोया दुलियों कु पाणी पीनी ।
फिर  भी अफकू मैं सट नी गिण्दू दादू
पर हैंकु मैं पहाड़ी समझी लाटू किले चितांद ।।

स्या तैकी समझ च मैं क्या बोली सकदू
जौंसणी स्यू घाट गिण्णु तौं मैं पणद्यारोंमा भी नी गिण्दू ।
पर क्यकन मेरू पहाड़ नेतौंन खयाल दादू
नीतर जदगा स्यू चौल नी खांदू! तैसे ज्यादा मैं उचाणा मा
रखदौं , फिर  भी अफकू मैं सट नी गिण्दू दादू
पर हैंकु मैं पहाड़ी समझी लाटू किले चितांद ।।

देखी होला तैन मनखी लाख, मैं इनकार नी करदू
पर इन कन सभी तैसणी चकडित ही मिलिन ?
मेरु व्यक्तित्व पाणी सी सरल च दादू
पहाडू पर मैं गर्जना करी की सैरु मा समझ से बगदौ,
फिर  भी अफकू मैं सट नी गिण्दू दादू
पर हैंकु मैं पहाड़ी समझी लाटू किले चितांद।।

माणा, चलिगी छा तुमरा दे दादा सैरु मा बीजां पहली
पर अब पहाड़ी भी उड़्यारों पर नी रै ज्ञेनी ।
बस नी छोड़ी सक्यां हमत अपणा संस्कार तुमारी तरौं दादू
दे दीना आज भी दाली की मुट्ट तुम जबरी औन्दा घौर,
फिर  भी अफकू मैं सट नी गिण्दू दादू
पर हैंकु मैं पहाड़ी समझी लाटू किले चितांद ।।

कमाई होला तुमन पैसा सैरु मा अफकू बीजां
पर वेसे ज्यादा धीबड़ा लगयां तुमारी कुड़ी पर यख ।
मैकू हुई च मनख बाघे डेर यूँ बांजी कुड़ियों पर दादू
त-रखी च राग जाग और लोग सोचणा की मैकू लोभ होयूँ,
फिर  भी अफकू मैं सट नी गिण्दू दादू
पर हैंकु मैं पहाड़ी समझी लाटू किले चितांद।।

केक होण तुमारू दिमाग गरम सोचिकि यखा का बारामा
दिमाग त ठण्डन चचगारेगी तौं सीमन्ट का भितरूमा
मैं फिर भी ये बुढ़ापामा तुमसे ठीक छौं दादू
मैं फुक्यों घामन यख और तुम तख मैं देखी फुक्यानदीरा,
फिर  भी अफकू मैं सट नी गिण्दू दादू
पर हैंकु मैं पहाड़ी समझी लाटू किले चितांदू ।।

लोगुन पीनी होलु घाट घाट कु पाणी दादू
मीन छोया दुलियों कु पाणी पीनी ।
फिर  भी अफकू मैं सट नी गिण्दू दादू
पर हैंकु मैं पहाड़ी समझी लाटू किले चितांद ।।

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                     -2-
   "बांजी पुंगडियों कु सारू"

सोचणु छौं की सब्सिडीकू ट्रैक्टर सरकार से ल्यौ
अर गौं की बांझी पुंगडियोंकू माटू खंदरोली द्यौ।
पर डन्नु छौं लुकरा ओडो देखी, नहो पितृ पूजी द्यौ,
उंत औण नी तैन घौर पर शायद च ट्रैक्टरकू घघराट सूणी बौडी जौ ।।

पहाडू की समस्या या नी कि पुंगड़ी बांजी पड़ी रौ,
पर तैकी खोपड़ी ह्वे जान्द खराब, जो हैकू खंदरोली द्यौ।
भले कत्ती बरषु बटी पँचमी मा तैकु ओडो पूजदी ग्यौं,
अर आज डौर या हुंई की ट्रैक्टर देखी स्यू ओडा पर जाड़ नी धौरी द्यौ ।।

स्यूत बैठयूँ सैर मा अर कुड़ी पर धीबाड़ा लज्ञान गौं मा
पुंगडियों की झाड़ी काटी-2 मैं श्याल बड्यू दुमलियोँ मा ।
कमाई धमाई कुछ नी दीदा, माटू उलगाणु छौं जलडौ मा,
अर स्यू द्वी दिन घर ऐकी शेर बड्यू रैंदू यूं बांजी पुंगडियों मा ।।

मेरी कुड़ी का अग्वाडी-पिछवाडी छन तैकि पुंगड़ी दीदा,
कदगी दां बोलेली तैकु यूँ पुंगडियोंकु सांटू मैंसे लील्या ।
पर हे राम ! कसम खाई तैकि जन, गाँठ बाँधी च मन मा,
बांझी छनत मेरी छन, किले? तैकि जाणी ये फ्टलीत येन अफी कन्न ।।

बात भी तैकि सही च दीदा, मेरी फ्टलीत मैनेत कन्न,
हौले-पगारे भी अब तैसे इनमा क्या बात कन्न ।
स्यू सोचणु की पतानी कदगा होणु अनाज यख,
अब ट्रैक्टर लाण मिन भी सोचियाल, तैकि जुकड़ी कु धगदयाट तेज वैने कन्न ।।

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              -3-
"गौंमा ब्वारीकु संवाद"

उक्री नी सकल्या जब तुम ये पहाड़
कख जैल्या जब नी सकेली स्या बूढ़ीयाण
कु होलू तैं खैरी की घड़ीमा तुम दगडी,हे जी !
चिंता न करा आज नी आला न सै,
पर या बूढ़ीयाण तौने लिजाण ।

नी पित्यावा तौं पुंगडियोमा इथगा
चुल्ला पर यकुली तुमन नी खुदयाण
हर कैमा तुमन सुधी नी रूसाण, हे जी !
चिंता न करा आज नी आला न सै,
पर या बूढ़ीयाण तौने लिजाण ।

तुम यख छन रूसाणा यूं पुंगडियोमा
अब कैन नी सुणण अर न कैन तुमके धै लगाण
पर सच्ची नी होला सुणणा उ देवता, हे जी !
चिंता न करा आज नी आला न सै,
पर या बूढ़ीयाण तौने लिजाण ।

पैलीत ज्युन्दा ज्युन्दी आला तुममा
तौंकी भी ह्वेगीन अब आश औलाद
नीतर मरयां मुक्क देखणत औला, हे जी !
चिंता न करा आज नी आला न सै,
पर या बूढ़ीयाण तौने लिजाण ।

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